‘शहज़ादी’ सिर्फ़ एक मजमुआ-ए-शायरी नहीं है और न ही यह किसी एक किरदार की कहानी है। यह उस पूरी कायनात की तहरीर है, जिसमें बेटियाँ हैं, माँएँ हैं, प्रेमिकाएँ हैं, यानी वो सभी औरतें हैं जो कभी चीख़ती नहीं, मगर हर रोज़ एक ख़ामोश लड़ाई लड़ती हैं। यानी यह किताब किसी एक तजुर्बे की पैदाइश नहीं है। यह उन सब अधूरे लम्हों की ज़मीन है, जो या तो ख़ामोश रह गए, या रोज़मर्रा की भीड़ में जज़्ब हो गए। यहाँ कोई हीरो नहीं, कोई ट्रैजिक विलन नहीं। यहाँ तो वो लोग हैं जो बिस्मिल्लाह में नज़र नहीं आते, मगर फ़ातिहा में याद ज़रूर किए जाते हैं।
इस किताब में आपको बड़े-बड़े नामों के हवाले नहीं मिलेंगे। न ही इसमें कोई दर्शन की भारी-भरकम बातें हैं। ये तो बस जज़्बात की नुमाइश है, बिना टिकट, बिना तामझाम। यहाँ जो भी लफ़्ज़ हैं, वो क़ाग़ज़ पर छपे हर्फ़ नहीं हैं, ये ज़िंदा लोग हैं। ये रिश्ते हैं। ये एहसासात हैं। इनमें एक महबूबा भी है, जो अलविदा नहीं कहती, बस चुपचाप चली जाती है। यहाँ वह सब है जो अक्सर छूट जाता है, जैसे एक बच्ची की आवाज़, एक माँ की थकान, एक बाप की ख़ामोशी, एक प्रेमी की तन्हाई और एक आदमी की अदृश्य टूटन।