कविताओं में पद्मजा के भीतर की औरत इतना बोलती है, इतना बोलती है जैसे डंडा लेकर खड़ी है। स्त्री हक़ की, आजादी की चौकीदार नजर आती है। इससे अलग स्त्री विमर्श क्या होगा। पद्मजा कहती है 'मैं सिर्फ शरीर नहीं मस्तिष्क भी हूँ/हाँ मष्तिष्क'। मैं भी तो यही कहती हूँ। यही है स्त्री विमर्श। धड़ के नीचे के हिस्से का स्वातंत्र्य तो एक अंश है। धड़ के ऊपर मष्तिष्क भी है। ये कविताएँ गहरी और सूक्ष्म समीक्षा की माँग करती हैं। ( चित्रा मुद्गल, दिल्ली ) पद्मजा शर्मा की कविताएँ स्त्री-मन के अन्तः प्रकोष्ठों की चितेरी हैं। स्त्री संवेदना उनके केंद्र में भी है, परिधि भी। पद्मजा बेहद आहिस्ते से स्त्री के दुख, सुखों (?) के अंतरंग में यात्रा करतीं और उनके मर्म को सहलाती हैं। स्त्री का समूचा जीवन, उसकी तड़प, कचोट, अवसाद और घुटन इन कविताओं में आतशी शीशे-सी उजागर है। यथा 'औरत' शीर्षक पंक्तियों में-'मैं रुकी तो बोले हार गई/झुकी तो बोले रीढ़ नहीं है/मैं बोली तो बोले जुबान कतरनी है/मैं मरी वे तब चुप हुए।' बेहद सादे-सूदे से भाषा शिल्प में ही वे ऐसे सच बयान कर जाती हैं जो हर किसी को उसके जिये जीवन के बहुत करीब महसूस होते हैं, यथा-'सौ बार मरती है तब जाकर औरत एक सवाल करती है... औरत भी ना कमाल करती है।' ( सूर्यबाला, मुंबई )