इन कविताओं से गुजरते हुए यह स्पष्ट होता है कि इनका मूल स्वर एक गहरा और व्यवस्था जन्य अवसाद है। कवि इस अवसाद की प्रकृति को न केवल सूक्ष्मता से पहचानता है, बल्कि उसके चप्पे-चप्पे पर जाकर उसे सघनता से महसूस भी करता है। यह संकलन इस बात की गहरी पड़ताल करता है कि कैसे एक क्रूर व्यवस्था मनुष्य के मनोविज्ञान और उसकी रचनात्मकता को घेरे में लेती है। यहाँ यह कह देना भी जरूरी है कि कविता केवल अवसाद का चित्रण भर नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था को उद्घाटित करने का एक साहस भी है जो मानवीय संवेदनाओं और व्यक्तिगत रिश्तों को क्षत-विक्षत करती है। इन रचनाओं में जहाँ एक ओर व्यवस्था की विसंगतियों पर प्रहार है, वहीं दूसरी ओर इस घुटन से बाहर निकलने की एक छटपटाहट भी है, जो पाठक को आत्म-साक्षात्कार के लिए प्रेरित करती है। पारिवारिक सम्बन्धों पर लिखी कविताओं के बिम्ब बहुत सुंदर और कोमल हैं।. ― केशव तिवारी , सुप्रसिद्ध कवि