यूँ तो ‘हंस’ अपनी वैचारिक गोष्ठियों और बहसों-रचनाओं द्वारा बार-बार दलित-समस्या को उठाता ही रहा है फिर भी दलित-संस्कृति और साहित्य को आज के सत्ता-विमर्श की जटिलताओं के सन्दर्भ में समझने की एक और कोशिश के रूप में ही हंस के दलित विशेषांक को दो खण्डों में पुस्तकाकार लाया गया है। (2004 के दलित विशेषांक की लोकप्रियता के बाद , हिंदी साहित्य की प्रतिष्ठित 'हंस ' पत्रिका ने सन 2019 ने दलित साहित्य पर पुनः दो भाग में विशेषांक प्रकाशित किये - कुछ नए और आज के समय के प्रतिष्ठित दलित लेखकों की सामग्री के साथ । पुस्तक संग्रहालयों ,पाठकों और शोधार्थियों की हम इसे आपकी सुविधा के लिए पुस्तक रूप ( दो खंड ) में लाये हैं. इन विशेषांकों को प्रसिद्ध दलित कथाकार अजय नवारिअ ने संकलित किया है।)