यूँ तो ‘हंस’ अपनी वैचारिक गोष्ठियों और बहसों-रचनाओं द्वारा बार-बार दलित-समस्या को उठाता ही रहा है फिर भी दलित-संस्कृति और साहित्य को आज के सत्ता-विमर्श की जटिलताओं के सन्दर्भ में समझने की एक और कोशिश के रूप में ही हंस के दलित विशेषांक को दो खण्डों में पुस्तकाकार लाया गया है। .(2004 के दलित विशेषांक की लोकप्रियता के बाद , हिंदी साहित्य की प्रतिष्ठित 'हंस ' पत्रिका ने सन 2019 ने दलित साहित्य पर पुनः दो भाग में विशेषांक प्रकाशित किये - कुछ नए और आज के समय के प्रतिष्ठित दलित लेखकों की सामग्री के साथ । पुस्तक संग्रहालयों ,पाठकों और शोधार्थियों की हम इसे आपकी सुविधा के लिए पुस्तक रूप ( दो खंड ) में लाये हैं. इन विशेषांकों को प्रसिद्ध दलित कथाकार अजय नवारिअ ने संकलित किया है। ) भारतीय राजनीति सत्ता की सतरंज पर दलितों और उनसे जुड़े किसी विमर्श को देखा जाता रहा -राजेंद्र यादव | दलित लेखकों के भोगे हुए यथार्थ बनती सहानुभूतियाँ- जिनमे अपने अनुभवों से रूबरू कराया है -श्याम लाल जैदिया ,सुदेश तंवर ,मनोज कुमार मार्तंड और सुधीर कुमार ‘परवाज’ दलित विमर्श पर केंद्रित महत्वपूर्ण पुस्तक – समाज, सत्ता और दलित समुदाय से जुड़े मुद्दों पर गहन विचार। प्रमुख लेखकों के विचार – राजेन्द्र यादव, श्योराज सिंह ‘बेचैन’, तुलसीराम आदि के लेख शामिल। सामाजिक और राजनीतिक विश्लेषण – जाति व्यवस्था, सामाजिक असमानता और परिवर्तन पर चर्चा। स्वानुभूति और जीवन अनुभव – दलित समाज के वास्तविक अनुभवों और संघर्षों को दर्शाने वाले लेख। शोध और अध्ययन के लिए उपयोगी – विद्यार्थियों, शोधार्थियों और सामाजिक विषयों में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए महत्वपूर्ण। कहानियाँ, कविताएँ और ग़ज़लों का संकलन – सामाजिक यथार्थ और दलित जीवन के अनुभवों को प्रस्तुत करती रचनाएँ। विभिन्न लेखकों की साहित्यिक अभिव्यक्ति – कई प्रमुख रचनाकारों की कहानियाँ, कविताएँ और ग़ज़लें शामिल। समाज और संवेदना को दर्शाती रचनाएँ – जीवन, संघर्ष और सामाजिक असमानताओं पर आधारित साहित्य। हाशिये की आवाज़ें – समकालीन दलित लेखन की विविध झलक प्रस्तुत करता संकलन। साहित्य प्रेमियों और शोधार्थियों के लिए उपयोगी – दलित साहित्य और सामाजिक विषयों में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए महत्वपूर्ण पुस्तक। सामाज में दलितों की न्याय व्यवस्ता