संसार के अलग-अलग स्थानों पर अनादिकाल से रहने वाले आदिवासियों को करीब से देखें तो पता चलता है कि इक्कीसवीं सदी का बड़ा हिस्सा बीत जाने के बावजूद इनके हालात में कोई ख़ास अंतर नहीं आया है। एक ओर ज्ञान-विज्ञान और तकनीकी की अकल्पनीय उन्नति हुई है, नयी-नयी खोजों और अनुसंधानों ने चमत्कृत किया है; यह क्रम जारी हैं और आगे भी जारी रहेगा। दूसरी ओर इन आदिवासियों को पिछड़ा तथा वंचित रखने का सुनियोजित षड्यंत्र भी जारी है। इसी का परिणाम है कि जल-जंगल और ज़मीन के वास्तविक ये दावेदार घोर ग़रीबी में जीने को विवश हैं और पौष्टिक भोजन, साफ़ पानी तथा प्राथमिक उपचार आदि से वंचित हैं और लगातार शोषण के शिकार होते चले आ रहे हैं। गरीबी के कारण अभावों को झेलने वाले सब से ज्यादा यही लोग हैं।