‘घिर गया है समय का रथ’ मराठी के विख्यात उपन्यास ‘कोंडी’ का हिन्दी अनुवाद है। ‘कोंडी’ का अर्थ होता है आसपास की कठिन स्थिति, बेहद प्रतिकूल स्थिति या फिर वैसी स्थिति से उत्पन्न तकलीफें। भारतीय समाज जीवन में कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था का अपना महत्त्व है। नब्बे के बाद ग्रामीण जीवन नगरीकरण के नये आक्रमण से पूरी तरह से घिर गया। परिणामस्वरूप ग्रामीण जीवन-मूल्यों में भारी परिवर्तन हुए। उन परिवर्तनों का चित्रण अपने लेखन के जरिये करने वाले उपन्यासकार के रूप में रवीन्द्र शोभणे जी की ओर देखा जाता है। उस दौरान युवा पीढ़ी के सवालों तथा उनकी मानसिकता में भारी परिवर्तन हो रहे थे। और उन परिवर्तनों की ओर ध्यान देना आवश्यक था। लेकिन सामाजिक और पारिवारिक स्तर पर इन सवालों और परिवर्तनों की ओर उतना ध्यान नहीं दिया जा रहा था। क्योंकि अपना समाज स्थिर था। अलबत्ता उस समय के साहित्य और कला के जरिये इन सवालों को अधिक गम्भीरता से देखा और सोचा जा रहा था। उसी दौरान यह उपन्यास मराठी क्षेत्र में दाखिल हुआ और उसने इन सवालों को कलात्मक तरीके से प्रस्तुत करने वाले उपन्यास के रूप में सबका ध्यान आकृष्ट कर लिया। वसन्ता बचपन से अपने पिता तथा परिवार पर होने वाले अन्याय को देखते हुए उस व्यवस्था के विरोध में खड़ा हो जाता है। परिस्थितियों को अपनी नियति मान चुके उसके माता-पिता को उसका इस तरह से व्यवस्था के खिलाफ खड़ा होना नागवार गुजरता है। इसी मतभिन्नता की वजह से दो पीढ़ियों का संघर्ष सामने आता है। जाने-अनजाने वसन्ता इस व्यवस्था में अमीरों के हाथों की कठपुतली बनकर रह जाता है। गाँव-कस्बों की राजनीति और वहाँ के नेता उसे अपनी सुविधा के अनुसार इस्तेमाल कर, जब आवश्यकता नहीं होती उसे दूर हटा देते हैं। गाँव में वह गुण्डे के रूप में बदनाम हो जाता है। किसी धनवान के हाथों की वह कठपुतली बन गया है, इस बात का उसे जब एहसास होता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। इस उपन्यास की रीढ़ है ग्रामीण परिवेश, वहाँ की परम्पराएँ, बोली-भाषा तथा संस्कारों आदि से जुड़े हुए वहाँ के आम लोग। ग्रामीण क्षेत्र ही नहीं बल्कि भारतीय युवाओं की मानसिकता को प्रभावी तरीके से अभिव्यक्त करने वाला यह उपन्यास मराठी साहित्य में अपनी विशिष्ट छाप छोड़ चुका है। सीधी-सादी भाषा, चुटीले व्यक्तिचित्रण, असरदार लेखन और सन्तुलित कथा-निर्वाह की वजह से ‘घिर गया है समय का रथ’ पाठकों के दिल तक पहुँचता है।