शहर लखनऊ किसी पहचान का मोहताज नहीं है। अँग्रेज़ी ज़माने के तमाम दस्तावेज़ इस शहर की वाह ! वाह ! और दाद से भरे पड़े हैं। सन् 1857-58 में तमाम तहस-नहस झेलने के बावजूद लखनऊ अपनी दरियादिली और नफ़ासत को साथ लिये हौसले के साथ खड़ा रहा। हालाँकि वक़्त बदल चुका था, साथ ही शहर का रंग-ओ-आब भी ढलने लगा था। शहर जिसकी नज़ीर वेनिस, पेरिस और कुस्तुंतुनिया से दी जाती थी उसकी आब उतर गयी थी। सन् 1947 के बाद लखनऊ वापस अपनी शोहरत के मक़ाम को उस दर्जा कभी हासिल न कर सका। आभिजात्यों का एक बड़ा हिस्सा, जो शहर की धुरी था, पाकिस्तान चला गया। सिन्ध से तमाम लोग आकर लखनऊ में बसे। इस आने-जाने-बसने में कहीं कुछ तो था जो उजड़ गया। अवाम के मन पर बर्फ़ जम गयी और शहर की रूह मानो ज़र्द हो गयी। ग़ौरतलब है कि सन् 1947 में भी शहर ने अपनी तहज़ीब की मिसाल क़ायम रखी। मज़हबी खून-खच्चर से लखनऊ अछूता रहा। मगर समय और सुख ने कब लौटना सीखा है ? लखनऊ वापस कभी अपने सुनहरे दौर में न लौट सका। ठहरता-चलता दिल देने की अपनी अदा पर क़ायम रफ़्ता-रफ़्ता आगे बढ़ता रहा। दर्ज इतिहास कम ही है इस शहर का। वो लोग भी अब कम बचे हैं जिनके सामने पुराने क़िस्से नुमायां हुए। कोई मिलता भी है तो बतायी गयी बातें इतिहास के दृष्टिगत पूरे काण्टेक्स्ट से जुड़ती नहीं हैं। इस वजह से शहर के पुराने हिस्से के दर-ओ-दीवार पर दर्ज इतिहास को पढ़ना बाजदफ़ा मुश्किल हो जाता है। बहुतेरी इमारतें ज़मीन्दोज़ हो चुकी हैं। कुछ जो धूल-धूसरित बदरंग सी बची हैं उनके बुर्ज, गुम्बद, मीनारें ‘शाम-ए-अवध’ की याद दिलाते हैं जिसका तज़किरा इनसे जुड़ता है। कहते हैं कि सुनहरी रंगत वाले इन बुर्जों और गुम्बद पर जब ढलते हुए सूरज की किरणें पड़ती थीं तो पूरा शहर आफ़ताब सा रौशन हो उठता था। यूँ लगता था कि इमारतें सोने में ढाली गयी हों। बहरहाल ये सारी चमक-दमक अतीत की बात हुई। आज की तारीख़ में तो सुनहरे अतीत के चश्मदीद रहे शहर के पुराने हिस्से मुलाक़ात होते ही अपनी बेतरतीबी और बदहाली से बेचैन करते हैं। उनपर लिखी ‘इबारत’ को न पढ़ पाना मायूस करता है। आरजू लखनवी का एक शे’र है : ‘जिसे आता है दिल देना, उसे हर काम आता है।’ लखनऊ ने तमाम नाकामियों और मायूसियों के बावजूद अपनी ये दिल देने की रवायत तो क़ायम रखी है, मगर इससे इतिहास की तहों तक पहुँचना मुमकिन नहीं हो पा रहा। इतिहास, जिसकी तस्दीक़ यहाँ की तहज़ीब और ज़बान से होती रहती है।