स्त्री : मिथक और यथार्थ प्राचीन भारतीय समाज में रूढ़ स्त्री की आदर्श छवि की पड़ताल है। स्त्री के दैवीय चमत्कारिक रूप से इतर उसके वास्तविक जैविक रूप के यथार्थ से परिचित होने की प्रक्रिया से गुजरने पर यह बात साफ होती है कि स्त्री को हाशिये पर सीमित रखने का एक दीर्घकालिक इतिहास है। न सिर्फ हिन्दुस्तान में बल्कि विश्व के वृहत् हिस्से में पुरुष के बरअक्स स्त्री का दर्जा दोयम है। इस दोयम स्थिति को बनाये रखने के लिए मिथक, किंवदन्ती, धर्म और तन्त्र के गठजोड़ का इस्तेमाल किया जाता रहा है। प्राचीन भारतीय साहित्यिक स्रोतों के अध्ययन से इस बात की तस्दीक की जा सकती है। प्रस्तुत पुस्तक इसी दिशा में एक पहलकदमी है